12 शिव ज्योतिर्लिंग- दर्शन मात्र से नष्ट होते हैं पाप

12 ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के वो 12 स्थान है जहां भगवान शिव स्वयं ज्योति रूप में विराजमान हैं। कहा जाता है कि बारह ज्योतिर्लिंगों का दर्शन करने वाला प्राणी सबसे भाग्यशाली होता है। आइए जानते हैं भगवान शिव के उन्हीं 12 स्थानों के बारे में, जिनके दर्शन करने मात्र से ही व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्ति मिलती है ।

(एक ग्राफिक्स प्लेट में 12 ज्योतिर्लिगों की pics )

1) सोमनाथ ज्योतिर्लिंग

गुजरात के सौराष्ट्र में स्थित सोमनाथ ज्योतिर्लिंग को पृथ्वी का पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। मान्यता है कि जब चन्द्रमा को दक्ष प्रजापति ने श्राप दिया था. तब चन्द्रमा ने इसी स्थान पर तप कर श्राप से मुक्ति पाई थी। इसका उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है। विदेशी आक्रमणों के कारण इस मंदिर का स्वरुप लगातार बदलता रहा है।

Somnath Temple
Somnath Temple

2) मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग
मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग आंध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैल पर्वत पर स्थित है। इस मंदिर का महत्व भगवान शिव के कैलाश पर्वत के समान कहा गया है। कहते हैं कि इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने मात्र से ही व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्ति मिलती है और दैहिक, दैविक और भौतिक ताप नष्ट हो जाते हैं।

Mallikarjuna Temple Jyotirlinga
Mallikarjuna Temple Jyotirlinga

 

3) महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग
यह ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित है। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की विशेषता है कि ये एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। यहां प्रतिदिन सुबह की जाने वाली भस्मारती दुनिया भर में प्रसिद्ध है। महाकाल को उज्जैन का राजा भी माना जाता है।

 

4) ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी के किनारे मान्धाता पर्वत पर स्थित है। यह ज्योतिर्लिंग औंकार अर्थात ऊं का आकार लिए हुए है, इस वजह से इसे ओंकारेश्वर नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि इनके दर्शन से व्यक्ति को चारों पुरुषार्थ यानि धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

 

5) केदारनाथ ज्योतिर्लिंग

ये ज्योतिर्लिंग उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है। केदारनाथ का वर्णन स्कन्द पुराण एवं शिव पुराण में भी मिलता है। कैलाश पर्वत की तरह ही केदार क्षेत्र भी शिव को अत्यंत प्रिय है। केदारनाथ क्षेत्र बद्रीनाथ मंदिर के मार्ग में स्थित है।

 

6) रामेश्वर ज्योतिर्लिंग
रामेश्वर ज्योतिर्लिंग तमिलनाडु के रामनाथपुरं में स्थित है। ये स्थान हिंदुओं के चार धामों में से भी एक है। मान्यता है कि लंका पर चढ़ाई से पहले भगवान राम ने इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना की थी, इसलिए इसे रामेश्वर ज्योतिर्लिंग कहते हैं.

 

7) भीमाशंकर  ज्योतिर्लिंग

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के पूणे में सह्याद्रि नामक पर्वत पर स्थित है। भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग को मोटेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर के विषय में मान्यता है कि जो भक्त इस मंदिर के प्रतिदिन सुबह सूर्य निकलने के बाद दर्शन करता है, उसके सात जन्मों के पाप दूर हो जाते हैं।

 

8) काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग
ये ज्योतिर्लिग उत्तर प्रदेश के वाराणसी में स्थित है। वाराणसी को काशी भी कहा जाता है। काशी सभी धर्म स्थलों में सबसे अधिक प्राचीन और महत्वपूर्ण स्थान रखती है। पुराणों के मुताबिक भगवान शिव ने कैलाश को छोड़कर काशी को ही अपना स्थायी निवास बनाया था। मान्यता है कि प्रलय काल का इस नगरी पर कोई असर नहीं पड़ता है।

 

9) त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग
त्र्यबकेश्वर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के नासिक जिले में स्थित है। भगवान शिव का एक नाम त्र्यंबकेश्वर भी है। कहा जाता है कि भगवान शिव को गौतम ऋषि और गोदावरी नदी के आग्रह पर यहां ज्योतिर्लिंग रुप में स्थापित होना पड़ा

 

10) बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग

बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग झारखंड के देवघर जिले में है। धर्म ग्रथों के अनुसार इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना रावण ने की थी । इस स्थान को देवघर यानि देवताओं का घर कहते हैं । इस ज्योतिर्लिंग को कामना लिंग भी कहते हैं

 

11) नागेश्वर ज्योतिर्लिंग

नागेश्वर ज्योतिर्लिग गुजरात के द्वारका में स्थित है। भगवान शिव का एक नाम नागेश्वर भी है। इस ज्योतिर्लिग के बारे में मान्यता है कि शिव की इच्छानुसार ही इसका नामकरण किया गया है। इस ज्योतिर्लिंग की महिमा में कहा गया है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और विश्वास से इसके दर्शन करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।

 

12) घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के दौलताबाद में है । इसे घुश्मेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर का अंतिम जीर्णोद्धार 18 वीं शताब्दी में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर के द्वारा करवाया गया था। रुद्रकोटिसंहिता, द्वाद्श ज्योतिर्लिंगस्तोत्रं के अनुसार ये ज्योतिर्लिंग बारहवें और अंतिम क्रम पर आता है.

 

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मंगला गौरी पूजा- महिमा और विधि-विधान

मंगला गौरी पूजामहिमा और विधिविधान

सावन के महीने में भगवान शिव की पूजा के साथ ही मां मंगला गौरी की पूजा का भी विधान है। खास तौर पर नवविवाहिताएं महिलाएं इस माह के प्रत्येक मंगलवार को मंगला गौरी व्रत करती है। कहते हैं कि मंगला गौरी के व्रत और पूजन से सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती। अविववाहित लड़कियां भावी जीवनसाथी के लिए तो शादीशुदा महिलाएं सुखी दांपत्य जीवन के लिए विशेष पूजा और अनुष्ठान करती हैं। इस दिन माता मंगला गौरी की कथा सुनना बेहद फलदायी माना गया है। आइए जानते हैं मां मंगला गौरी की पूजा का क्या महत्व है

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता । 

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

 

क्या हैं मंगला गौरी व्रत के लाभ?

सावन के मंगलवार के दिन ‘मंगला गौरी व्रत’ का विधान बताया गया है। इस व्रत को करने से सुहागन महिलाओं को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। सौभाग्य प्राप्ति के लिए इस दिन को विशेष माना जाता है। सावन में मां गौरी की पूजा मंगलकारी होती है। मंगलवार को मां गौरी की उपासना से विवाह संबंधी समस्याएं दूर होती हैं। साथ ही वैवाहिक जीवन की भी हर समस्या दूर होती है। मंगल दोष की वजह से परेशानी आ रही हो तो भी बेहद लाभ होता है।

कैसे करें पूजन?

  • इस दिन शिव-पार्वती और हनुमान जी की आराधना करें।
  • शिव मंत्र –  ॐ ह्रं कामदाय वर्प्रियाय नमः शिवाय।
  • मंगलागौरी मंत्र – ह्रीं मंगले गौरि विवाहबाधां नाशय स्वाहा।
  • हनुमान मंत्र – क्रौं बीजात्मा नयनयोः पातु मां वानरेश्वरः हं हनुमते नमः।
  • तीनों मंत्रों का रुद्राक्ष की माला से एक-एक माला जाप करें।
  • ग्राफिक्स हेडर – मां मंगला गौरी पूजा विधान (गौरी पूजा करती हुआ महिलाओं की फोटो)
  • सावन के मंगलवार को सुबह या शाम मां गौरी की पूजा करें
  • मां गौरी के सामने घी का एक चौमुखी दीपक जलाएं
  • लाल रंग की चुनरी और लौंग समर्पित करें
  • साथ ही लाल रंग के फूल चढाएं
  • इसके बाद मां के सामने ‘ऊं ह्रीं गौर्ये नमः” मंत्र का जाप करें
  • मां से शीघ्र विवाह होने की प्रार्थना करें
  • इन उपायों और मंत्र जाप से शिव-पार्वती के साथ ही श्री हनुमान जी की भी विशेष कृपा प्राप्त होती है, और विवाह संबंधी सभी बाधाओं से मुक्ति मिल जाती है

 

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Kashi Vishwanath Temple

Kashi Vishvanath Temple is one of the most famous Hindu temples dedicated to Lord Shiva. It is located in Varanasi, Uttar Pradesh, India. The temple stands on the western bank of the holy river Ganga, and is one of the twelve Jyotirlingas, the holiest of Shiva temples. The main deity is known by the name Vishvanatha or Vishveshvara meaning Ruler of The Universe. Varanasi city is also called Kashi, and hence the temple is popularly called Kashi Vishvanath Temple.

Know suprising facts about Kashi Vishwanath Temple:

  • The Divine Golden Chatra on Top: The temple has a golden chatra on top. It is believed that any wish is fulfilled if it is made after seeing the chartra.
  • Shanidev come to Kashi in search of Lord Shiva: It is believed that when the earth was created the first ray of light fell on Kashi. There are legends that believe that Shiva had actually stayed here for some time. Shiva is supposed to the guardian of the city and its people. It is said that in Kashi even the nine planets cannot do their own free will and have to abide by Shiv. Shani was supposed to have come to Kashi in search of Shiv and could not enter the temple for 7 and half years. When you visit Kashi you will see the temple for Shanidev outside the Vishwanath temple.
  • Devotees visit Jyotirlinga to attain Moksha: It is believed that a faithful attains salvation (Moksha) if they are able to see the Shivlingam.
  • Construction of the Kashi Vishwanath temple: Mughal Emperor Akbar gave permission to build the original temple, which was later destroyed by Aurangazeb.
  • Jyotirlingas in Kashi Vishwanath temple: Kashi Vishwanath is revered as one of the 12 Jyotirlingas of Shiva. It is also said that Lord Shiva actually stayed here for some time. Kashi has been derived from the word KAS, which literally means to shine

 

What is the significance behind the temple?

Varanasi is regarded among the holiest of the Hindu cities. The Kashi Vishwanath temple is widely recognized as one of the most important places of worship in Hindu religion. Inside the Kashi Vishvanath Temple is the Jyotirlinga of Shiva, Vishveshvara or Vishvanath. The Vishveshvara Jyotirlinga has a very special and unique significance in the spiritual history of India.

Many leading saints, including Adi Sankaracharya, Ramakrishna Paramhansa, Swami Vivekananda, Bamakhyapa, Goswami Tulsidas, Swami Dayananda Saraswati, Sathya Sai Baba and Gurunanak have visited the site. A visit to the temple and a bath in the river Ganges is one of many methods believed to lead one on a path to Moksha. Because of the immense popularity and holiness of Kashi Vishwanath temple, hundreds of temples across India have been built in the same architectural style. Many legends record that the true devotee achieves freedom from death and saṃsara by the worship of Shiva. Shiva’s devotees on death being directly taken to his abode on Mount Kailash by his messengers and not to Yama.

 

Architectural Style: Hindu Temple

Address: Lahori Tola, Varanasi, Uttar Pradesh 221001

Date built: 1780

Built by: Ahilyabai Holkar

Contact No. 0542 239 2629

Temple Timings:

The Kashi Vishwanath Temple opens daily at 2:30 AM and closes at 11 PM.

 

Puja/Worship Details:

There are 5 aartis of Shree Kashi Vishwanath:

. Mangala Aarti :- 3.00 – 4.00 (Morning).

. Bhoga Aarti :- 11.15 to 12.20 (Day).

. Sandhya Aarti :- 7.00 to 8.15 (Evening).

. Shringara Aarti :- 9.00 to 10.15 (Night).

. Shayana Aarti :- 10.30-11.00 (Night).

Security arrangements do not allow any cell phones, camera, belts with metal buckle, cigarettes, lighters, etc. inside the temple.

 

How to Reach:

  • By Air – The nearest airport to the city is Babatpur which is 22 km from Varanasi. Direct flights are operated by Air India as well as other private airlines from cities like Delhi, Mumbai, Kolkata, Chennai, Agra, Bhubaneswar and Lucknow.
  • By Train – The nearest Railway Station is Varanasi Junction or the Mughal Sarai Junction. Several trains connect the city to almost all major parts of the country like Delhi, Chennai, Howrah, Jammu, Ahmedabad, Bengaluru, Mumbai and Guwahati.
  • By Road – The city is located on NH2 highway linking Kolkata to New Delhi. Several buses are available from places like Delhi, Agra, Lucknow, Kanpur, Allahabad, Patna, Nagpur, Gorakhpur, Azamgarh and Gaya.

 

Places of Interest:

  1. Tulsi Manas Temple: This temple is yet another important shrine in Varanasi. Dedicated to Lord Rama, Tulsi Manas Temple is situated next to another famed shrine called Durga Temple. It is a white-marble temple that has its walls covered with the text from Tulsi Das written Ramcharitramanas. It is believed that the temple is located at a place where Tulsi Das wrote this famous Indian epic.

 

  1. Kathwala Temple: This temple is famous for its exquisite architecture and wood work. It is believed that the temple was built by King of Nepal and thus, this shrine is also called Nepali Temple. It is situated in the Lalita Ghat and catches the attention of many visitors in Varanasi. The intricate wood carving is what attracts visitors the most; the temple reflects the refined taste for good architecture taste of the rulers of Nepal.

 

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Omkareshwar Shiva Jyotirlinga

Know about miracles, interesting facts & stories of Omkareshwar Shiva Jyotirlinga

Omkareshwar Jyotirlinga also has its own stories and out of all the stories, three of them are considered very prominent. The first story is about Vindhya Parvat (Mount). Once day Narada (son of Lord Brahma), visited Vindhya parvat and told him about the greatness of Mount Meru. After listening all the paise, jealous Vindhya decided to be bigger than Meru. He started worshipping Lord Shiva  and practiced severe penance in order to please him. He made parthivlinga (A linga made from physical material) and worshipped him along with Lord Omkareshwar for six months. Shiva was pleased with the worship and blessed him with his desired boon. Shiva made two parts of the linga. One half is called Omkareshwara and the other Mamaleshwar or Amareshwar.

While giving boon Lord Shiva also took a promise that Vindhya will never be a problem to Shiva’s devotees. Vindhya began to grow and did not keep his promise. It even obstructed the sun and the moon. All deities approached sage Agastya for help. Agastya along with his wife came to Vindhya, and convinced him that he would not grow until the sage and his wife returned. They never returned and Vindhya is there as it was when they left. The sage and his wife stayed in Srisailam which is regarded as Dakshina Kashi and one of the Dwadash Jyotirlinga.

Story of King Mandhata: The second story relates to Mandhata and his son’s penance. King Mandhata of Ikshvaku clan (an ancestor of Lord Ram) worshipped Lord Shiva here till the Lord manifested himself as a Jyotirlinga. Some scholars also narrate the story about Mandhata’s sons-Ambarish and Muchukunda, who had practiced severe penance and austerities here and pleased Lord Shiva. Because of this the mountain is named Mandhata.

Story associated with Dev & Danav war: The third story from Hindu scriptures says that once upon a time there was a great war between Devas and Danavas(demon), in which Danavas won. This was a major setback for Devas and hence Devas prayed to Lord Shiva. Pleased with their prayer, Lord Shiva emerged in the form of Omkareshwar Jyotirlinga and defeated Danavas.

Address: Omkareshwar Mandir Road, Mandhata, Madhya Pradesh 451115

District: Khandwa

Websitehttp://omkareshwar.org/ , http://shriomkareshwar.org/

Opening timings: All days of the week

5:00 AM – 10:00 PM

Darshan Timings:

  • 5 AM to 3:50 PM, 4:15 PM to 9:30 PM.
  • The Mangal Aarti is done between 5 AM to 5:30 AM
  • The Jalabhishek is done between 5:30 AM to 12:25 PM.
  • The evening darshan begins at 4:15 PM and the evening.
  • Aarti is conducted from 8:20 PM to 9:05 PM.
  • Special darshan is available for handicapped people or for people who are unable to stand for general darshan.

How to reach?

  • By Air: The nearest airport is Indore (75KM), Connected by regular flights from all over India. Indore having direct flights from Mumbai, Delhi, Kolkata, Ahmedabad and measure cities . Almost most of the airlines are operating in Indore.
  • By Rail: Nearest railhead is Omkareshwar road (Mortakka) 12 KM on ratlam Khandawa section of Western Railway. Presently this route is closed for gauge change.
  • By Road: Omkareshwar is connected to Indore Khandawa and Ujjain by regular bus services.

Accommodation Facilities:

There are about 50 Dharmashalas available in Omkareshwar to stay. Most of them are newly constructed and are equipped with modern amenities. The Temple administration does not run any Dharmashala or Ashram.

 

Other Places to Visit:

  • Mammaleshwar Temple – The other half of the Omkareshwar Jyotirlinga is situated here. The Linga itself is called Amareshwar. This temple holds a great religious significance. The temple is comparatively less crowded than its counterpart Omakareshwar.

 

  • Saptamatruka temple –This temple is dedicated to the famed seven goddesses who helped the great Shakti Devi in fighting with demons. The names of the seven goddesses worshiped here in order are Brahmani, Vaishnavi, Maheshvari, Indrani, Kaumari, Varahi, Chamunda and Narasimhi.

 

  • Sri Siddeshwar Temple or the Siddhnath Barahdwari – This marvelously protected temple is located on the plateau. The central shrine has four entrances and sabha mandaps. All the four sabha mandaps contain 18 pillars, each of 14 inches height.

 

  • Gauri Somnath Temple – This temple can be visited during the Parikrama around the Parikrama Path. Pilgrims have to climb 270 steps to reach the sanctum. The Lingam of Lord Shiva is 6 feet high made in shining black stone.

 

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क्यों है सावन का इतना महत्व?

सावन और शिव सावन का महत्व 

महादेव भक्तों की हर मुराद पूरी करते हैं और कष्टों से मुक्ति भी दिलाते हैं यही वजह है कि सावन के महीने में बाबा भोलेनाथ का दरबार भक्तों के सैलाब से गुलजार नजर आता है। सावन के महीनें में शिव की आराधना का विशेष महत्व है। कहते हैं कि सावन और शिव एक दुसरे के बिना अधूरे हैं। सावन के इस पवित्र महीने में जो कोई भी देवों के देव “महादेव” का वंदन करता है तो भगवान उसकी हर मूराद पूरी कर देते हैं। आखिर क्यों प्रिय है, देवाधिदेव महादेव को सावन का महीना और क्या है श्रावण मास का महत्व आइए जानते हैं।

Lord Shiva (1)
Lord Shiva (1)

वैसे तो सावन और शिव को लेकर कई मान्यताएं हैं लेकिन उनमें से समुद्र मंथन की कथा, भगवान विष्णु के योगनिद्रा में जाने की कथा और आदिशक्ति का सती से पार्वती बनने की कथा सबसे ज्यादा मान्य है।कहते हैं समुद्र मंथन के वक्त जब हलाहल नामक विष सागर से निकला था तो सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान भोलेनाथ ने उस विष को अपने गले में धारण कर लिया था। यह घटना सावन के महीने में हुई थी। विष के ताप को शांत करने के लिए ब्रह्माजी के कहने पर देवताओं ने शिव जी का जलाभिषेक किया था और जड़ी बूटियों का भोग लगाया था जिससे महादेव का ताप शांत हुआ।

एक सनातन मान्यता ये भी है कि सावन के महीने में भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं जिसके बाद सृष्टि के संचालन का पूरा जिम्मा भोलेनाथ ग्रहण करते हैं। इस तरह से सावन के महीने में देवों के देव महादेव सभी देवताओं के प्रधान बन जाते हैं। यही वजह है की सावन में भोलेनाथ की पूजा करने से कई गुना फल प्राप्त होता है।

Lord Vishnu

 

माता पार्वती के जन्म की कथा

शास्त्रों में माता पार्वती के जन्म को लेकर भी सावन के महीने का जिक्र मिलता है। कहते हैं, माता सती के देहत्याग करने के बाद जब आदिशक्ति ने पार्वती के रुप में जन्म लिया तो, सावन के महीने में तपस्या कर भगवान शिव को प्राप्त करने का वरदान प्राप्त किया। यानि, शिव और शक्ति का मिलन भी इसी महीने में हुआ था इसलिए सावन का महीना शिव को अत्यंत प्रिय होता है। शिव को सावन का देवता भी कहा जाता है। सावन का महीना हिंदी कैलेंडर में पांचवे स्थान पर आता है और यहीं से वर्षा ऋतू भी प्रारंभ होती है। सावन का महीना हर लिहाज से बाबा भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए सबसे शुभ होता है और इसके बदले जो फल भक्त को मिलता है, वह उसे हमेशा कष्टों से दूर रखता है।

 

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शिव से जुड़ी 7 प्रमुख चीजों की कहानी 

कहते हैं, जटाधारी शिवशंकर बहुत भोले हैं इसलिए वह अपने सभी भक्तों की पुकार सुन लेते हैं लेकिन क्या आप यह जानते हैं की महादेव को जिस रुप में हम देखते हैं वह रुप उन्हें कैसे प्राप्त हुआ? भगवान शिव का ध्यान करने मात्र से ही मन में जो एक छवि उभरती है, वह छवि एक वैरागी की होती है जिनके एक हाथ में त्रिशूल ,दूसरे हाथ में डमरु, गले में सांपो माला, सिर पर त्रिपुंड का चंदन, माथे पर अर्धचन्द्र और सिर पर जटाजूट जिससे गंगा की धारा बह रही है। साथ ही साथ बगल में वाहन नंदी खड़े नजर आते हैं। यह वह सात चीजें हैं जो भगवान शिव से जुड़ी हुई हैं। दुनिया में कहीं भी चले जाइये आपको शिवालय में शिव के साथ ये सात चीजें जरुर दिखेंगी।

आइए जानते हैं इन 7 चीज़ों कि मान्यता:

1) चंद्र शिव के मस्तक पर विराजमान चंद्र की बहुत मान्यता हैं। शिव पुराण के अनुसार चन्द्रमा का विवाह दक्ष प्रजापति की 27 कन्याओं से हुआ था जिन्हें  27 नक्षत्र भी माना गया है। इनमें चन्द्रमा रोह‌णी से विशेष स्नेह करते थे। इसकी शिकायत जब अन्य कन्याओं ने दक्ष से की तो दक्ष ने चन्द्रमा को क्षय होने का श्राप दे दिया और इस श्राप से बचने के लिए उन्होंने भगवान शिव की तपस्या की। तपस्या से प्रसन्न होकर शिव जी ने चन्द्रमा के प्राण बचाए और उन्हें अपने शीश पर स्‍थान दिया।

Chandra

 

2) धनुष  ऐसा माना जाता हैं की धनुष का अविष्कार तो भोलेनाथ ने खुद किया था इसलिए शिव को संसार का सबसे बडा धनुर्धारी कहा गया है। महाभारत में और महाकवि कालिदास की रचना किरातअर्जुनियम में शिव के इस धनुर्धारी रूप की चर्चा की गई है।

 

3) त्रिशूल सनातन मान्यता है कि सृष्टि के आरंभ में जब शिव ब्रह्मनाद से प्रकट हुए तो, उनके साथ ही रज, तम और सत नाम के तीन गुण भी प्रकट हुए। यही तीनों गुण शिव जी के शूल यानि,  त्रिशूल बने। लिहाजा, सृष्टि में सामंजस्य बनाए रखने के लिए उन्होंने त्रिशूल रूप में इन तीनों गुणों को अपने हाथों में धारण किया।

 

4) डमरू शिवशंभू के हाथ में डमरू आने की कहानी भी बड़ी ही रोचक है। सनातन मान्यताओं के मुताबिक जब सृष्टि के आरंभ में देवी सरस्वती प्रकट हुईं तब देवी ने अपनी वीणा के स्वर से सृष्टि में ध्वनि को जन्म दिया था और भगवान शिव ने उस समय नृत्य करते हुए चौदह बार डमरू बजाए। इस ध्वनि से व्याकरण और संगीत के छंद, और ताल का जन्म हुआ। डमरू को ब्रह्म का स्वरूप माना जाता है जिसे महादेव अपने साथ लेकर प्रकट हुए थे।

 

5) नाग शिव के गले में एक नाग हमेशा लिपटा होता है जिसे हम वासुकी भी कहते हैं। शिव पुराण में बताया गया है कि, नागलोक के राजा शिव के परम भक्त थे और सागर मंथन के समय उन्होंने रस्सी का काम किया था, जिससे सागर को मथा गया था। इनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिव ने अपने गले में आभूषण की तरह लिपटे रहने का वरदान दिया।

 

6) नंदी नंदी के बारे में मान्यता है कि नंदी और शिव एक ही हैं क्योंकि महादेव ने  नंदी के रुप में भी जन्म लिया था और शिव जी की तपस्या से नंदी शिव गणों में प्रमुख हुए। जिससे उन्हें शिव का वाहन बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।

 

7) गंगा भगीरथ के तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने भगीरथ को वरदान देते हुए गंगा को स्वर्ग से धरती पर आने के लिए कहा लेकिन गंगा के वेग से पृथ्वी की रक्षा के लिए शिव जी को उन्हें अपनी जटाओं में बांधना पड़ा। मान्यता ये भी हैं कि गंगा, भगवान शिव के करीब ही रहना चाहती थी इसलिए धरती पर उतरने से पहले उन्होंने प्रचंड रूप धारण कर लिया। तब शिव ने पृथ्वी की रक्षा के लिए गंगा को अपनी जटाओं में स्‍थान दिया।

 

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कैसे शुरू हुई कांवड़ यात्रा ?

क्या था कांवड़ यात्रा के शुरुआत होनें का इतिहास?

सावन महीने के आरंभ होते ही सभी शिवालयों और मंदिरों में भक्तों का तांता लग जाता है। पुरुष हो या महिला हर कोई शिव की भक्ति में लीन हो जाते हैं। कहते हैं, इस महीने में कांवड़ यात्रा करने वाले श्रद्धालु पर भोलेनाथ की कृपा हमेशा बनी रहती है।

Lord Shiva

मान्यता तो ये भी है कि “कांवड़ यात्रा” साक्षात शिव का स्वरुप होती है। शिव भक्तों का मानना है कि सावन के महीने में कांवड़ उठाने वाले भक्तों के साथ चलते हैं स्वयं “भगवान शिव”। वैसे तो कांवड़ यात्रा की शुरुआत को लेकर विद्वानों के अलग-अलग मत रहे हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि भगवान गणेश को एकदंत करने के बाद भोलेनाथ के क्रोध को शांत करने के लिए सबसे पहले भगवान परशुराम ने कांवड़ यात्रा की थी और गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर भोलेनाथ को अर्पित किया था। जबकि कुछ विद्वानों का ये भी मानना हैं कि, सबसे पहले श्रवण कुमार ने त्रेतायुग में कांवड़ यात्रा की शुरुआत की थी। एक और मान्यता के मुताबिक, श्रवण कुमार ने अपने अंधे माता-पिता की इच्छा पूरी करने के लिए उन्हें कांवड़ में बिठा कर हरिद्वार लाए और गंगा स्नान कराया था। एक लोकप्रिय मान्यता ये भी है कि, कांवड़ यात्रा की शुरुआत भगवान राम ने की थी। वह पहले कांवड़िये थे जिन्होंने बिहार के सुल्तानगंज से कांवड़ में गंगा जल भरकर बाबाधाम शिवलिंग में जलाभिषेक किया था। पुराणों के मुताबित, समुद्र मंथन से निकले हलाहल के नकारात्मक प्रभाव को कम करने के लिए शिवजी ने चंद्रमा को अपने माथे पर धारण कर लिया था। इसके बाद सभी देवताओं ने शिव जी पर गंगाजल लाकर अर्पित किया था।

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सावन के महीने में कांवड़ यात्रा को लेकर कई मान्यता है लेकिन प्रत्येक मान्यता में कांवड़ यात्रा को आस्था का प्रतीक माना जाता है। यह भक्तों का विश्वास है कि, कांवड़ यात्रा के दौरान जो शिवभक्त तमाम कष्टों को सहते हुए गंगाजल लाकर शिवलिंग पर अर्पित करते हैं, भोलेनाथ उनके तमाम कष्टों को हमेशा के लिए हर लेते हैं।

 

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परशुराम जयंती 2018 – जानें भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम की कहानी

  • परशुराम का अर्थ

परशुराम दो शब्दों से मिलकर बना हैं – परशु मतलब “कुल्हाड़ी” और राम यानी  “पुरुषोत्तम राम”। अगर इन दोनों शब्दों को मिलाएं तो अर्थ हुआ “कुल्हाड़ी के साथ राम ”। जैसे भगवान राम विष्णु जी के अवतार हैं वैसे ही परशुराम भी भगवान विष्णु के अवतार हैं। परशुराम जी को भी भगवान राम और विष्णु के समान ही शक्तिशाली माना जाता हैं। भगवान विष्णु के 6वें अवतार के रूप में परशुराम पृथ्वी पर अवतरित हुए थे।

 

  • रामभद्र राम से कैसे बने परशुराम :

परशुराम के जन्म का नाम राम माना जाता है तो कुछ लोग रामभद्र मानते हैं। इन्हें भार्गव, भृगुपति, जमदग्न्य, भृगुवंशी आदि नामों से भी जाना जाता है। मान्यता है कि दुनिया से पापों को खत्म करने के लिए इन्होंने भगवान शिव की कड़ी तपस्या की और उनसे युद्ध कला में निपुणता का वरदान पाया। इन्हें कई अद्वितीय शस्त्र भी प्राप्त हुए और इन्हीं में से एक था भगवान शिव का परशु जिसे फरसा या कुल्हाड़ी भी कहते हैं। यह इन्हें बहुत प्रिय था व इसे हमेशा साथ रखते थे। परशु धारण करने के कारण ही इन्हें परशुराम कहा गया।

  • जानिए परशुराम जयंती के बारे में:

परशुराम जयंती वैशाख मास की शुक्ल तृतीया को मनाई जाती है। इस पावन दिन को अक्षय तृतीया कहा जाता है क्योंकि इस दिन का पुण्य कभी अक्षय यानि कभी भी कम नहीं होता, कभी समाप्त नहीं होता। अक्षय तृतीया के दिन जन्म लेने के कारण ही भगवान परशुराम की शक्ति भी अक्षय थी। मान्यता है कि पराक्रम के प्रतीक भगवान परशुराम का जन्म 6 उच्च ग्रहों के योग में हुआ, इसलिए वह तेजस्वी, ओजस्वी और वर्चस्वी महापुरुष बने।

  • तोड़ दिया था भगवान गणेश का दांत –

हिन्दू मान्यतायों के अनुसार एक बार परशुराम भगवान शिव के दर्शन करने के लिए कैलाश पर्वत गए थे लेकिन इस समय शिव जी गहरी तपस्या में लीन थे इसीलिए भगवान गणेश ने उन्हें मिलने से इनकार कर दिया। इस बात पर परशुराम को क्रोध आ गया और उन्होंने अपने फरसे से भगवान गणेस का एक दांत तोड़ दिया था। इस वजह से भगवान गणेश एकदंत भी कहा जाता है।

इस अक्षय तृतीय मिलेगा धन लाभ, जानिए कैसे करें व्रत!

वैशाख शुक्ल तृतीया को अक्षय तृतीया कहते हैं। इस दिन को अक्षय तृतीय इसीलिए कहा जाता हैं क्योंकि इस दिन किया हुआ जप, तप, ज्ञान तथा दान अक्षय फल देने वाला होता है। यदि यह व्रत सोमवार तथा रोहिणी नक्षत्र में आए तो महा फलदायक माना जाता है। इस दिन जो भी शुभ कार्य किए जाते हैं, उनका बड़ा ही श्रेष्ठ फल मिलता है। मान्यता यह भी हैं की इसी दिन से सतयुग का आरंभ होता है इसलिए इसे युगादि तृतीया भी कहते हैं। इस दिन जो भी शुभ काम किया जाता है उसका फल अक्षय होता है यानी इसका पुण्य कभी खत्म नहीं होता है। जानिए क्या करना चाहिए अक्षय तृतीय के दिन:

 

अक्षय तृतीय का व्रत:

* व्रत के दिन ब्रह्म मुहूर्त में सोकर उठें।

* घर की सफाई व नित्य कर्म से निवृत्त होकर पवित्र या शुद्ध जल से स्नान करें।

* घर में ही किसी पवित्र स्थान पर भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।

* संकल्प करके भगवान विष्णु को पंचामृत से स्नान कराएं।

* षोडशोपचार विधि से भगवान विष्णु का पूजन करें।

* भगवान विष्णु को सुगंधित पुष्पमाला पहनाएं।

* नैवेद्य में जौ या गेहूं का सत्तू, ककड़ी और चने की दाल अर्पण करें।

* अगर हो सके तो विष्णु सहस्रनाम का जप करें।

* अंत में तुलसी जल चढ़ाकर भक्तिपूर्वक आरती करनी चाहिए।

* इस दिन उपवास भी रखना चाहिए।

इस दिन पूर्वजों यानी पितरों का पिण्डदान, तर्पण और दान, अक्षय फल से सराबोर कर देता है। यह दिन ग्रीष्म ऋतु के आगमन को भी दर्शाता हैं इसलिए इस दिन सत्तू, खरबूजा, चावल, खीरा, ककड़ी, साग, इमली, जल के पात्र जैसी वस्तुओं के दान देने की भी परंपरा है।

जानिए बैसाखी मनाने के रोचक ऐतिहासिक कारण

बैसाखी का आगमन प्रकृत्ति के परिवर्तन को दर्शाता है। इस दिन सूर्य मीन राशि से मेष राशि पर प्रवेश करेगा। ऐसा माना जाता है कि हजारों साल पहले देवी गंगा इसी दिन धरती पर उतरी थीं। उन्हीं के सम्मान में हिंदू धर्मावलंबी पारंपरिक पवित्र स्नान के लिए गंगा किनारे एकत्र होते हैं। बैसाखी का यह खूबसूरत पर्व अलग अलग राज्‍यो में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। केरल में यह त्योहार ‘विशु’ कहलाता है। बंगाल में इसे नब बर्षा, असम में इसे रोंगाली बिहू, तमिल नाडू में पुथंडू और बिहार में इसे वैषाख के नाम से पुकारा जाता है। बैसाखी का पर्व पंजाब के साथ-साथ पूरे उत्‍तर भारत में धूम-धाम से मनाया जाता है।

 

 

बैसाखी मनाने के पीछे के कारण-

 

  1. किसानों के लिये महत्‍वपूर्ण दिन- बैसाखी का संबंध फसल के पकने की खुशी का प्रतीक है। इसी दिन गेहूं की पक्की फसल को काटने की शुरूआत होती है। किसान इसलिए खुश हैं कि अब फसल की रखवाली करने की चिंता समाप्त हो गई है। इस दिन किसान सुबह उठकर नहा धोकर मंदिरों और गुरुदृारे में जाकर भगवान को अच्‍छी फसल होने का धन्‍यवाद देते हैं। इस पर्व पर पंजाब के लोग अपने रीति रिवाज के अनुसार भांगडा और गिद्धा करते हैं।

 

  1. खालसा पंथ की स्थापना- बैसाखी के ही दिन 13 अप्रैल 1699 को सिखों के दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। सिख इस त्योहार को सामूहिक जन्मदिवस के रूप में मनाते हैं।

 

  1. मौसम के बदलाव का पर्व- बैसाखी का पर्व जब आता है उस समय सर्दियों की समाप्ति और गर्मियों का आरंभ होता है। इसी के आधार स्वरुप लोक परंपरा धर्म और प्रकृति के परिवर्तन से जुड़ा यह समय बैसाखी पर्व की महत्ता को दर्शता है।

 

  1. व्यापारियों के लिए भी अहम दिन- इस दिन देवी दुर्गा और भगवान शंकर की पूजा होती है। कई जगह व्यापारी लोग आज के दिन नये वस्त्र धारण करके अपने बहीखातों का आरम्भ करते हैं।