अहोई अष्टमी 2017: संतान रक्षा की लम्बी आयु के व्रत की क्या है विशेष मान्यता और राधा कुंड का राज़?

अहोई अष्टमी व्रत की बहुत ही मान्यता है जैसे वट सावित्री और करवाचौथ के व्रत से पति की आयु लम्बी होती है ठीक उसी तरह अहोई अष्टमी का व्रत को संतानों की लम्बी आयु के लिए किया जाता है इस साल यह व्रत 12 अक्टूबर को किया जाएगा इस दिन सभी माँ पूरे दिन निर्जला उपवास रखती है सायंकाल को दीवार को खडिय़ा मिट्टी से पोतकर उसपर अष्ट कोष्ठक (आठ कोनों वाली) की अहोई माता का स्वरूप बनाकर उनमें लाल गेरू और पीले रंग की हल्दी से सुन्दर रंग भरती हैं। साथ ही स्याहू माता (सेई) के बच्चों के भी चित्र बनाकर सजाती हैं। तारा निकलने से पहले अहोई माता के सामने जल का पात्र भरकर उस पर स्वास्तिक बनाती हैं और उसके सामने सरसों के तेल का दीपक जलाकर अहोई माता का विधि विधान से पूजन करती हैं और कथा सुनती हैं।

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अहोई माता के सामने मिट्टी की हांडी यानी मटकी जैसा बर्तन रखकर उसमें खाने वाला सामान प्रसाद के रूप में भरकर रखा जाता है। इस दिन ब्राह्मणों को पेठा दान में देना अति उत्तम माना जाता है।

कृष्ण की नगरी मथुरा: एक स्थान है कृष्ण की नगरी मथुरा में स्थित राधा कुंड। माना जाता है अगर कोई नि:संतान दंपति एक साथ अहोई अष्टमी यानि कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी की आधी रात को इस कुंड में स्नान करता है तो उसे जल्द ही संतान सुख मिलता है।

मान्यतानुसार यहां स्नान करने वाली महिलाएं अपने केश खोलकर राधा जी से संतान का वरदान मांगती हैं और राधा जी उन्हें यह वरदान देती भी हैं। एक बार एक राक्षस ने बछड़े का रूप लेके कृष्णा पर हमला कर दिया, जिसके चलते श्री कृष्णा को उसका वध करना पड़ा इससे श्री कृष्णा पर गौहत्या का पाप लग गया प्रायश्चित करने के लिए श्री कृष्णा ने एक कुंड बनाया और उसे तीर्थ स्थानों के जल से भरा राधा ने इसमें कृष्णा की बहुत मदद की और प्रसन्न होकर उन्होंने राधा को आशीर्वाद दिया की जो भी नि:संतान दंपत्ति अहोई अष्टमी की रात यहां स्नान करेगी उसे जल्द ही संतान की प्राप्ति होगी।

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