जानिए भगवान शंकर के लिए किए जाने वाले “प्रदोष व्रत” का महत्त्व और कथा..!

प्रदोष व्रत साल में कई बार आता है कई बार यह व्रत महीने में दो बार भी आ जाता है लेकिन हर बार इस व्रत से मिलने वाला लाभ अलग होता है..! प्रदोष व्रत शिवजी को प्रसन्न रखने के लिए किया जाता है।

प्राचीन काल में एक विधवा स्त्री अपने पुत्र को लेकर भिक्षा लेने जाती थी और संध्या को लौटती थी। एक दिन जब वह भिक्षा लेकर वापिस आ रही थी तो उसे नदी किनारे एक सुन्दर बालक दिखाई दिया। वह बालक विदर्भ देश का राजकुमार धर्मगुप्त था। युद्ध में शत्रुओं ने उसके पिता को मारकर उसका राज्य हड़प लिया था और उसकी माता की भी मृत्यु हो गई।

उस स्त्री को नहीं पता था की वह बालक कौन हैं उसने बालक को अपना लिया और उसका पालन-पोषण किया। वह उसे उतना ही प्यार करती थी जैसे अपने पुत्र को करती थी राजकुमार भी उसके साथ बहुत खुश रहता था। एक दिन ब्राह्मणी की भेंट ऋषि शाण्डिल्य से हुई। ऋषि ने ब्राह्मणी को बताया कि जो बालक उन्हें मिला है वह विदर्भदेश के राजा का पुत्र है जो युद्ध में मारे गए थे और उनकी माँ की मृत्यु भी अकाल हुई थी.

उस स्त्री को यह सुनकर बहुत दुःख हुआ ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को प्रदोष व्रत करने की सलाह दी। ऋषि आज्ञा से दोनों बालकों ने भी प्रदोष व्रत करना शुरू किया। सभी ने ऋषि द्वारा बताए गए पूर्ण विधि-विधान से ही व्रत सम्पन्न कियालेकिन वह नहीं जानते थे कि यह व्रत उन्हें क्या फल देने वाला है।

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एक दिन दोनों बालक वन में घूम रहे थे तभी उन्हें कुछ गंधर्व कन्याएं नजर आईं। ब्राह्मण बालक तो घर लौट आया किंतु राजकुमार धर्मगुप्त वहीं रह गए। वे वहां “अंशुमती” नाम की एक गंधर्व कन्या की ओर आकर्षित हो गए थे और उनसे बात करने लगे। गंधर्व कन्या और राजकुमार एक-दूसरे पर मोहित हो गए कन्या ने राजकुमार को अपने पिता से मिलवाने के लिए बुलाया। दूसरे दिन जब वह पुन: गंधर्व कन्या से मिलने आया तो गंधर्व कन्या के पिता को मालूम हुआ कि वह विदर्भ देश का राजकुमार है। भगवान शिव की आज्ञा से गंधर्वराज ने अपनी पुत्री का विवाह राजकुमार धर्मगुप्त से कराया। इसके बाद राजकुमार धर्मगुप्त ने बेहद संघर्ष कियादोबारा से अपनी सेना तैयार की और युद्ध करके अपने विदर्भ देश पुनः प्राप्त किया। उन्हें यह ज्ञात हुआ कि जो कुछ भी उन्हें हासिल हुआ है वह सब ब्राह्मणी और राजकुमार धर्मगुप्त के प्रदोष व्रत करने का फल था। भगवान शिव ने उन्हें जीवन की हर कठिनाई से लड़ने की शक्ति प्रदान की।

तभी से यह मान्यता हो गई कि जो भक्त प्रदोष व्रत के दिन शिवपूजा के बाद एकाग्र होकर प्रदोष व्रत कथा सुनता या पढ़ता है उसे सौ जन्मों तक कभी दरिद्रता नहीं होती। उसके जीवन के सभी कष्ट अपने आप ही दूर होते जाते हैं। भोलेनाथ उनके जीवन पर समस्या के बादल नहीं आने देते।

 

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