जानिए वसंत पंचमी का क्या हैं महत्त्व..!

वसंत पंचमी का पर्व हिंदी पंचांग के माघ शुक्ल की पाचवीं तिथि को मनाया जाता हैं और अंग्रेजी पंचांग में यह दिन जनवरी-फरवरी माह को मनाया जाता हैं। वसंत पंचमी का दिन माँ सरस्वती की पूजा की जाती हैं क्योंकि माँ सरस्वती को समस्त ऋतुओं व सभी तरह की कला और ज्ञान की जननी कहा जाता हैं पुराणों में कहा गया हैं कि वसंत पंचमी के दिन ब्रहमा जी के मुख से सरस्वती जी प्रकट हुई थी इस लिए इस पर्व को सरस्वती जयंती के रूप में भी मनाया जाता हैं।

 

वसंत पंचमी यानि वसंत ऋतु का आगमन। इस दिन से प्रकृति रूप से बदलाव होना आरंभ हो जाता हैं। साथ ही पतझड़ का मौसम खत्म होकर हरियाली की तरफ बढता हैं। भारतवर्ष की धरती पर छः ऋतु अपना-अपना प्रकृति सौंदर्य बिखेरती रहती हैं और इनमे वसंत ऋतु को श्रेष्ट माना जाता है और इसी कारणवर्ष इसे समस्त ऋतु का ऋतुराज भी कहा जाता हैं। क्योंकि इस दिन प्रकृति को नया जीवन व नया योवन प्राप्त होता हैं और वह नई उमंग के साथ अपना सौंदर्य बिखरने लगती हैं। वसंत पंचमी का दिन एक विशेष महत्व रखता हैं इसलिए इस दिन को बच्चे ही नही अपितु बूढ़े, जवान व संगीत और कला के महान साधक बढे ही हर्षो उल्लास से मनाते हैं। इस दिन अनेक मंदिर व पूजा स्थल सजाये जाते हैं जो देखने में बड़े ही मनोहर लगते हैं। वसंत पंचमी का पर्व हर किसी के जीवन में एक नवीन उत्साह व इस्फुर्ती लाता हैं।

  • आध्यात्मिक रूप-

वसंत ऋतु में त्रिपदा गायत्री की पूजा की जाती हैं। गायत्री, सावित्री और सरस्वती एक ही ब्रह्मशक्ति के नाम हैं। इस समस्त संसार में सत-असत जो कुछ भी हैं, वह ब्रहमा स्वरूप ही हैं। त्रिपदा गायत्री को वेदों की देवी कहा जाता हैं अर्थात ये ज्ञान की जननी और पाप-विनाशिनी हैं। उनके तात्विक स्वरूप में गायत्री मंत्र के तीन पदों में प्रथम पद की देवी गायत्री हैं. श्री व्यास जी कहते हैं- गायत्री मंत्र से बढ़कर अन्य कोई पवित्र मंत्र पृथ्वी पर नहीं है। गायत्री मंत्र ऋक्, यजु, साम, काण्व, कपिष्ठल, मैत्रायणी, तैत्तिरीय आदि सभी वैदिक संहिताओं में प्राप्त होता हैं।

मध्यकाल-

माँ गायत्री जिनका वाहन हंस हैं और ये वीणा, वेदों व श्वेत वस्त्रो को धारण किये हुए हैं, ये प्रातः –काल में अवतरित होती हैं मध्यकाल की संध्या में यही सावित्री कहलाती हैं, युवती के रूप में चक्र, गदा, शंख, पदम् व पीले वस्त्र धारण किये हुए हैं। ये जगत पालक विष्णु की आदशक्ति हैं।

सांध्यकाल-

सांध्यकाल में यही शक्ति सरस्वती कहलाती हैं, वृषभ पर बेठी हैं डमरू व त्रिशूल धारण किये हुए हैं। भगवान शिव की शक्ति हैं। इस प्रकार यह पर्व सद्गुण के तीनो गुणों सत, रज और तम अर्थात कार्य भेद से ब्रह्मा, विष्णु, महेश त्रिदेव का पूजन हो जाता हैं।

 

  • भौगोलिक रूप-

वसंत पंचमी यानि वसंत ऋतु का आरंभ होना। शिशिर ऋतु के बाद वसंत ऋतु का आगमन होता हैं। इस ऋतु में प्रकृति अपने पुरे चरम पर होती हैं पतझड़ के बाद हरियाली प्राम्भ हो जाती हैं जिससे समस्त प्रकृति को एक नवीन यौवन प्राप्त होता हैं। प्रकृति हर जगह अपनी शोभा बिखरने लगती हैं। भौगोलिक रूप से देखा जाये तो 21 मार्च को पृथ्वी का दक्षिणी ध्रुव से झुकाव समाप्त हो जाता हैं और उत्तरी गोलार्ध में प्रवेश हो जाता है इसे ‘विषुव’ दिन भी कहते हैं। इस दिन रात और दिन बारह-बारह घंटे के होते हैं और ये दिन वर्ष में दो ही बार आता है 21 मार्च और 23 सितम्बर। इसके बाद सूर्ये उत्तरायण में प्रवेश कर चूका होता है और भौतिक एवं आध्यात्मिक रूप से उपलब्धियों वाला हो जाता हैं।

 

  • पुराणिक रूप-

पुराणों के अनुसार ब्रह्माण्ड की रचना का कार्य शुरू करते समय ब्रह्मा जी ने मनुष्य को बनाया, लेकिन’ उनके मन में दुविधा थी की समस्त संसार में चारो तरफ सन्नाटा सा परसा हुआ हैं तब उन्होंने अपने मुखर से माँ सरस्वती को प्रकट किया। जो उनकी मानस पुत्री कह लायी, जिन्हें हम सरस्वती देवी के रूप में जानते हैं, उनके जन्म के बाद उनसे वीणा वादन को कहा गया तब देवी सरस्वती ने जैसे ही स्वर को बिखेरा वैसे ही धरती में कम्पन्न हुआ और मनुष्य को वाणी मिली और धरती का सन्नाटा खत्म हो गया धरती पर पनपने हर जिव जंतु, वनस्पति एवम जल धार में एक आवाज शुरू हो गई और सब में चेतना का संचार होने लगा इसलिए इस दिवस को सरस्वती जयंती के रूप में मनाया जाता हैं।

 

  • रामायण के अनुसार-

रामायण के कथानुसार जब रावण ने सीता का हरण किया तब माता सीता ने अपने आभूषणों को धरती पर फेका था जिससे उनके हरण मार्ग का ज्ञान श्री राम को हो सके उन्ही आभूषण के जरिये श्री राम ने माता सीता की तलाश शुरू की और उन्हें खोजते- खोजते श्री राम दंडकारण्य जा पहुँचे जहाँ वे शबरी से मिले। शबरी के झूठे बेर खाकर शबरी के जीवन का उद्धार किया, कहा जाता हैं कि वह दिन वसंत पंचमी का दिन था इसलिए आज के दिन शबरी माता के मंदिर में वसंत उत्सव मनाया जाता हैं।

  • सूफीमत के अनुसार-

ऐसा माना जाता हैं की दिल्ली के मशहुर सूफी संत हज़रत निजामुद्दीन औलिया का एक किस्सा भी वसंत पंचमी के लिए बहुत मशहुर हैं। एक बार हज़रत निजामुद्दीन औलिया के भांजे ‘तकियुद्दीन नूर’ जिनसे हज़रत निजामुद्दीन औलिया बहुत ज्यादा प्यार करते थे एक दिन उनके भांजे की बीमारी के चलते मृत्यु हो गयी। जिस कारण हज़रत निजामुद्दीन सदमे में चले गए और सबसे बात करना छोड़ दिया। ये देख कर हज़रत निजामुद्दीन के शिष्य ‘अमीर खुसरों’ बहुत ज्यादा दुखी हो गये। अमीर खुसरों ने हज़रत निजामुद्दीन औलिया को खुश करने के सारे प्रयास कर लिए लेकिन वो असफल रहे ये देख कर वो मायूसी लिए दिल्ली के समीप एक रास्ते पर सोचते हुए जा रहे थे तभी उन्हें कुछ स्त्रियो के गाने-बजाने की आवाज़ सुनाई दी उन्होंने देखा की वो स्त्रियो पीले वस्त्र धारण किये पास ही के एक देवी के मंदिर जा रही है जब आमिर खुसरों जानना चाहा ये सब क्या हैं तब उन स्त्रियो ने बताया आज वसंत पंचमी का पावन त्यौहार  है और वो पीले वस्त्र और गाना बजा कर अपनी देवी को खुश करने जा रही हैं। ये देख आमिर खुसरों भी वही पीले वस्त्र धारण कर और एक रुबाई गाते हुए हज़रत निजामुद्दीन औलिया के पास पहुचे ये देखकर निजामुद्दीन औलिया बहुत जोरो से खिलखिला कर हसने लगे तब हज़रत निजामुद्दीन ने पूछा- “खुसरों ये क्या स्वांग रचाए हुए हो” और आमिर खुसरों ने सारा किस्सा बताया की कुछ स्त्रिया ये सब वेशभूषा पहन कर अपनी देवी को खुश करने के लिए गीत गाते हुए जा रही थी और तभी मेरे मन में सुझाव आया क्यों न मैं भी अपने गुरु को खुश करने के लिए कुछ ऐसा ही करू। ये सब सुनकर हज़रत निजामुद्दीन औलिया बहुत प्रसन्न हुए और तभी से तमाम सूफी संतो के स्थान पर यह दिन बड़े ही हर्षौल्लास से मनाया जाता हैं और ये दिन गंगा-जमुनी तहज़ीब को भी उजागर करता हैं।

  • दान की महत्ता

वसंत पंचमी के दिन दान की अत्यंत महत्ता है वसंत पंचमी के दिन अन्न दान, वस्त्र दान का महत्व होता हैं आज के दिन सरस्वती जयंती को ध्यान में रखते हुए गरीब बच्चो की शिक्षा के लिए दान दिया जाता हैं। इस दान का स्वरूप धन अथवा अध्ययन में काम आने वाली वस्तुओं जैसे किताबे, कॉपी, पेन आदि होता हैं।

समस्त संसार में वसंत पंचमी की महत्ता को देखा जा सकता है जो पूरी मानव जाति के लिए बड़े ही हर्षौल्लास का समय होता हैं। प्राकृतिक रूप से वसंत पंचमी के समय प्रकृति में विभिन्न बदलाव देखने को मिलते हैं। वसंत पंचमी का यह पर्व हमे सांस्कृतिक, धार्मिक व प्राकृतिक तीनो गुणों में हमे गद-गद करता हैं। वसंत पंचमी का ये पावन दिन हमारी आतंरिक चेतना को हमेशा गोरान्वित करता हैं।

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