जानिए स्कन्द षष्ठी का महत्त्व, व्रत कथा एवं विधि..!

स्कन्द षष्ठी, कार्तिक मास में पड़ने वाली षष्टी तिथि को मनाई जाती है। दक्षिण भारत में इस त्यौहार की बहुत ही मान्यता है और सभी लोग इस तिथि को एक उत्सव के रूप में बहुत ही श्रधा भाव से मनाते हैं। इस दिन भगवान शिव के पुत्र, कार्तिकेय की पूजा की जाती है। कहते हैं इस दिन संसार में हो रहे गलत कर्मों को ख़तम करने के लिए कार्तिकेय का जन्म हुआ था।

स्कन्द, मुरुगन, सुब्रमण्यम यह सभी नाम भगवान कार्तिकेय के हैं। इस दिन से जुड़ी बहुत सारी रोमांचक मान्यताएं भी सिद्ध हैं। कहते हैं कि स्कंद षष्ठी की उपासना से च्यवन ऋषि को आंखों की ज्योति प्राप्त हुई। इस दिन यह भी बताया गया है की स्कंद षष्ठी की कृपा से प्रियव्रत का मृत शिशु के प्राण लौट आए थे।

आइए जानते है इस तिथि से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा। राक्षस तारकासुर का अत्याचार हर जगह फ़ैल गया था जिसके कारण सभी देवताओं को हार का सामना करना पड़ रहा था। एक दिन सभी देवता मिल कर ब्रह्म देव के पास पहुचें और उनसे अपनी रक्षा के लिए प्राथना करने लगें। ब्रह्म देव ने उन्हें बताया की तारकासुर का वध भगवान शिव के पुत्र के अलावा कोई नहीं कर सकता लेकिन माँ सति के अंत के बाद शिवजी साधना में लीन हो गए थे। सभी देवता भगवान शिव के पास गुहार लेकर गए और शिवजी ने उनकी बात सुनकर पार्वती से विवाह किया। अच्छे मुहूर्त में विवाह होने के बाद कार्तिकेय का जन्म हुआ और उन्होंने तारकासुर का वध किया।

इस दिन कार्तिकेय के साथ साथ भगवन शिव और माँ पार्वती की पूजा करने का भी विशेष महत्त्व है। इस दिन दान आदि कार्य करने से विशेष लाभ मिलता है। स्कंद देव की स्थापना करके अखंड दीपक जलाए जाते हैं। भगवान को स्नान, पूजा, नए वस्त्र पहनाए जाते हैं। इस दिन भगवान को भोग लगाते हैं। स्कंद षष्ठी पूजन में  तामसिक भोजन मांस, शराब, प्याज, लहसुन का त्याग करना चाहिए और ब्रह्मचर्य आवश्यक होता है। कहते है इस दिन भगवान कार्तिकेय पर दही में सिंदूर मिलाकर चढ़ाने से व्यावसायिक परेशानियाँ ख़तम होती हैं और आर्थिक स्तिथि अच्छी होती हैं। इस दिन पुरे मन से भगवान कार्तिकेय का पूजन करना चाहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *