तुलसी विवाह: माँ तुलसी और भगवान विष्णु की अनोखी कहानी एवं पूजा विधि..!!

भारत में तुलसी को अतुल्निय पौधा और सबसे पवित्र जड़ी बूटी का स्थान दिया गया है। लोग सुबह श्याम माँ तुलसी की पूजा करते है। तुलसी की नियमित पूजा करने से हमें सुख समृधि प्राप्त होती है। हिन्दू पुराणों में तुलसी विवाह की बहुत महत्वता है। देवउठनी एकादशी के बाद ही तुलसी विवाह मनाया जाता है।

तुलसी विवाह के पीछे एक बहुत ही सुन्दर कथा सम्बंधित है। जालंधर नामक राक्षस ने चारों तरफ़ कहर मचा रखा था। वह बहुत ही शक्तिशाली, वीर तथा पराक्रमी था। उसकी शक्ति और वीरता का रहस्य था- उसकी पत्नी वृंदा का पतिव्रता धर्म। अपनी पत्नी के कारण से ही वह सर्वजंयी बना हुआ था। जालंधर के कहर से परेशान होकर एक बार सब देवगण भगवान विष्णु के पास गये और उनसे मदद की प्राथना की। उनकी प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु ने वृंदा का पतिव्रता धर्म में बाधा डालने का प्रयास किया, जो की सफल रहा। वृंदा का पतिव्रता धर्म भंग होते ही, जालंदर, देवताओं से हो रहे एक युद्ध में मारा गया। वृंदा को इस बात का पता लगते ही उन्होंने क्रोध में भगवान विष्णु को श्राप दे दिया। उन्होंने श्राप में कहा: “जिस प्रकार तुम्हारे छल ने मुझे मेरे पति से दूर कर दिया, उसी प्रकार तुम भी अपनी पत्नी से छलपूर्वक वियोग सहना होगा जिसके लिए तुम मृत्यु लोक में जन्म लोगे।“  यह कहकर वृंदा अपने पति के साथ सती हो गई। जिस जगह वह सती हुई वहाँ तुलसी का पौधा उत्पन्न हुआ।

एक और प्रसंग के अनुसार वृंदा ने विष्णु जी को यह श्राप दिया था कि तुमने मेरा सतीत्व भंग किया है इसीलिए तुम पत्थर के बनोगे। विष्णु बोले, ‘हे वृंदा! यह तुम्हारे सतीत्व का ही फल है कि तुम तुलसी बनकर मेरे साथ ही रहोगी। विष्णु जी ने कहा की “जो मनुष्य तुम्हारे साथ मेरा विवाह करेगा, वह परम धाम को प्राप्त होगा।“

कैसे करनी चाहिए पूजा..?

  • बिना तुलसी दल के शालिग्राम या विष्णु जी की पूजा अधूरी मानी जाती है। शालिग्राम और तुलसी का विवाह भगवान विष्णु और महालक्ष्मी के विवाह का प्रतीकात्मक विवाह है।

  • तुलसी विवाह संपन्न कराने के लिए एकादशी के दिन व्रत करना चाहिए और तुलसी जी के साथ विष्णु जी की मूर्ति घर में स्थापित करनी चाहिए।

  • तुलसी के पौधे और विष्णु जी की मूर्ति को पीले वस्त्रों से सजाना चाहिए। पीला विष्णु जी की प्रिय रंग है।

  • तुलसी विवाह के लिए तुलसी के पौधे को सजाकर उसके चारों तरफ गन्ने का मंडप बनाना चाहिए।

  • तुलसी जी के पौधे पर चुनरी या ओढ़नी चढ़ानी चाहिए। इसके बाद जिस प्रकार एक विवाह के रिवाज होते हैं उसी तरह तुलसी विवाह की भी रस्में निभानी चाहिए।

  • पंडित या ब्राह्मण की सहायता से भी तुलसी विवाह संपन्न कराया जा सकता है अन्यथा मंत्रोच्चारण (ऊं तुलस्यै नम:) के साथ स्वयं भी तुलसी विवाह किया जा सकता है।

  • द्वादशी के दिन पुन: तुलसी जी और विष्णु जी की पूजा कर और व्रत का पारण करना चाहिए।

  • भोजन के पश्चात तुलसी के स्वत: गलकर या टूटकर गिरे हुए पत्तों को खाना शुभ होता है। इस दिन गन्ना, आंवला और बेर का फल खाने से जातक के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।

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