रामनवमी महत्त्व, व्रत कथा और विधि !!

रामनवमी का महत्त्व

रामनवमी, श्री राम की जन्मोत्सव की स्मृति में मनाया जाता है। भगवान श्री राम का जन्म चैत्र महीने की शुक्ल पक्ष की नवमी को अयोध्या में हुआ था। रामनवमी के दिन ही गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना का श्रीगणेश किया था। राम भगवान् श्री विष्णु के अवतार है। त्रेता युग में रावन का आतंक हर तरफ मचा हुआ था और उन्होंने अपने असीम शक्तियों के बल पर नवग्रहों और काल को भी बंदी बना लिया था। कोई भी मानव और देव उनके प्रताप का सामना नहीं कर पा रहा था इसीलिए भगवन विष्णु ने धर्म की स्थापना के लिए राम के रूप में पृथ्वी पर अवतार लिया।

रामनवमी व्रत कथा

एक बार की बात है जब राम, सीता और लक्ष्मण वनवास पर थे। एक बार वन में चलते-चलते भगवान राम ने जब लक्ष्मण को थका देखा तो उन्होंने थोड़ा विश्राम करने का सोचा। पास ही में एक वृद्ध महिला रहती थी विश्राम के लिए स्थान खोजते खोजते भगवान राम, लक्ष्मण और माता सीता उस वृद्ध महिला के पास पंहुच गये जो उस समय सूत कात रही थी उन्होंने उनका बहुत अच्छे से आवभगत किया और उन्हें स्नान ध्यान करवा भोजन करने का आग्रह किया

भगवान राम ने कहा – “माई मेरा हंस भी भूखा है पहले इसके लिये मोती ला दो ताकि फिर मैं भी भोजन कर सकूं।” वह वृद्ध महिला मुश्किल में पड़ गई क्यूंकि वो खुद ही बहुत मुश्किल से अपना गुज़ारा करती थी पर घर आये मेहमानों का निरादर करना उचित नहीं समझा वह शीग्र ही राजा के पास गई और उनसे उधार में मोती देने हो कहा राजा यह मांग देखकर बहुत ही आश्चर्य में पड़ गया उसे मालूम था कि वृद्ध महिला की हैसियत नहीं है मोती लौटाने की परंत्तु फिर भी उसने मोती दे दिए। उस वृद्ध महिला ने वो मोती लाकर हंस को खिला दिए जिसके बाद भगवान श्री राम ने भी भोजन किया। जाते-जाते भगवान राम बुढिया के आंगन में मोतियों का एक पेड़ लगा गये।

कुछ समय बाद पेड़ बड़ा हुआ मोती लगने लगे लेकिन उस वृद्ध महिला को इस बात का ज्ञात नहीं हुआ। जब भी मोती उस पेड़ से गिरते उसे आस पास के लोग उठाकर ले जाते थे। एक दिन वेह पेड़ के नीचे बैठी सूत कात रही थी की पेड़ से मोती गिरने लगे बुढ़िया उन्हें समेटकर राजा के पास ले गई और लौटा दिए। राजा आश्चर्यचकित हो उठा कि बुढ़िया के पास इतने मोती कहा से आये उसने बता दिया की उसके आंगन में पेड़ है जिस पर मोती उगते है राजा को लालच आ गया और वह पेड़ अपने आंगन में मंगवा लिया लेकिन पेड़ पर कांटे उगने लगे। एक दिन एक कांटा रानी के पैर में चुभा तो राजा से सहन न हो सका उसने तुरंत ही वो पेड़ को दोबारा प्रथम स्थान पर लगवा दिया और श्री राम की कृपा से फिर से मोती लगने लगे वह वृद्ध महिला जो इतने कष्ट से जीवन व्यतीत कर रही थी अब आराम से वह मोती प्रसाद के रूप में बेचती और सुखी जीवन जीने लगी

रामनवमी व्रत व पूजा विधि

रामनवमी में राम पूजन का अत्यंत महत्त्व है इस दिन जो भक्त दिन भर संपूर्ण श्रधा से उपवास रखते है और दान पुण्य करते है, उनके हर रुके हुए कार्य हो जाते है यह व्रत अनेक जन्मो के जन्मोंके पापों को भस्म करने में भी समर्थ होता है। इस दिन की शुरुआत भक्त को सनान आदि से निवृत होकर श्री राम नाम का नाम और ॐ जय जगदीश की आरती से करना चाहिए श्री राम मांगलिक थे तभी उनका वैवाहिक जीवन दुःख और कष्ट से भरा हुआ था इसीलिए मान्यता ये है कि सभी प्रकार के मांगलिक कार्य इस दिन बिना मुहूर्त विचार किये भी संपन्न किये जा सकते हैं। इनका व्रत जीवन में सुख शांति और समृद्धि के लिये रखा जाता है रामनवमी पर पूजा के लिये पूजा सामग्री में रोली, ऐपन, चावल, स्वच्छ जल, फूल, घंटी, शंख आदि लिया जा सकता है। भगवान राम और माता सीता व लक्ष्मण की मूर्तियों पर जल, रोली और ऐपन अर्पित करें तत्पश्चात मुट्ठी भरकर चावल चढायें। फिर भगवान राम की आरती, रामचालीसा या राम स्त्रोतम का पाठ करें। आरती के बाद पवित्र जल को आरती में सम्मिलत सभी जनों पर छिड़कें।

रामनवमी के दिन उपवास रखने वाले व्यक्ति को सुबह जल्दी उठकर घर की साफ सफाई कर स्नानादि के बाद व्रत का संकल्प करना चाहिये। जिस समय व्रत कथा सुनें उस समय हाथ में गेंहू या बाजरा आदि अन्न के दाने रखें। घर, पूजाघर या मंदिर को ध्वजा, पताका, बंदनवार आदि से सजाया भी जा सकता है।

क्या करे:

1) नवरात्रि के नौंवे दिन यानी रामनवमी के दिन मां दुर्गा के नवमें स्वरूप सिद्धिदात्री की आराधना करनी चाहिए और पूर्ण श्रद्धा से मां दुर्गा के नाम का दीप प्रज्ज्वलित करना चाहिए

2) रामचरितमानस के बालकाण्ड, राम रक्षास्त्रोत, हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, सुंदर कांड आदि का पाठ करना अत्यंत फलदायी और कल्याणकारी होता है. ऐसा करने से ना सिर्फ अक्षय पुण्य मिलता है बल्कि धन संपदा के निरंतर बढ़ने के योग जाग्रत होते हैं।

3) अपनी क्षमता और श्रधा अनुसार गरीब-असहाय लोगों को दान पुण्य भी करना चाहिए

4) ऐसा माना गया है की राम जन्मोत्सव को ऐसे मनाना चाहिए जैसे घर में नन्हे शिशु जन्मा हुआ हो

5) इस शुभ अवसर पर कुंआरी कन्याओं को भोजन करना चाहिए और उन्हें उपहार देना चाहिए

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