वैष्णो देवी : जानेंगे कहाँ है माँ का अखंड आसन, अमृत जलधारा और अन्य अद्भुत रहस्य..!

विश्व-भर में माता के एक मंदिर ही अत्यधिक मान्यता है और वह है – वैष्णो देवी…! कहते है माँ अपने भक्तों को स्वयं यहाँ आने का बुलावा भेजती है, तभी यह नारा प्रसिद्ध है – चलो बुलावा आया हैमाता ने बुलाया है

जो भी भक्त यहाँ के दर्शन कर लेता है उसकी सारी मनोकामनाएं दूर हो जाती है और मन पवित्र हो जाता है मान्यता यह है की माँ स्वयं यहाँ विराजमान है हर साल लाखों की गिनती में तीर्थयात्री यहाँ के दर्शन करते है

  • ऐसा माना जाता है की वैष्णो देवी की गुफा करीब 98 फीट लंबी है। इसी गुफ़ा में एक चबूतरा बना हुआ है जहाँ पर मां का आसन है। यहाँ पर माँ स्वयं विराजमान होती है इसीलिए इसे माँ का अखंड वास भी माना जाता है।

  • यहाँ गुफा में स्थित एक स्थान को गर्भपूजन भी कहा जाता है। जैसे जन्म से पहले शिशु 9 महीने तक गर्भ में रहता है, ऐसा मन जाता है की माँ ने भी इसी प्रकार यहाँ निवास किया था। जो यहाँ के दर्शन करने आता है उसे माँ की असीम कृपा प्राप्त होती है और वह जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है।

  • मंदिर तक पहुँचने के लिए एक बहुत ही प्राचीन गुफ़ा का प्रयोग किया जाता है, जिसकी बहुत ही मान्यता है। मान्यता यह है की इसी गुफा में भैरव का शरीर है। माता ने यह पर भैरव को अपने त्रिशूल से मारा था।

  • यहाँ चरण पादुका भी हैं। भैरवनाथ के डर से जब कन्या के रूप में माता पहाड़ो की ओर भागने लगी तब कुछ पल के लिए उनके चरण यहाँ रुके थे उन्होंने पीछे मुड़कर भैरवनाथ को आते हुए देखा था और उनकी चरणों की छाप यहाँ पड़ गए आगे चलकर यही माता के चरण चिन्ह हुए।

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  • फिर माता इस गुफा में चली आई और यहाँ नौ माह तक तपस्या कर शक्ति प्राप्त की। तपस्या के बाद माँ ने बाण छोड़ कर सामने पहाड़ से जलधारा निकाली और इसमे अपने केश धोए। इसे बाणगंगा कहा जाता हैं। यहाँ का पानी बहुत ही पवित्र होता है। जब भी भक्त माता के दर्शन के लिए आते हैं तो इस जलधारा में स्नान अवश्य करते हैं।

  • वैष्णवी ने महाकाली का रूप लेकर भैरवनाथ का संहार कर दिया। भैरवनाथ का सिर कटकर भवन से 8 किलोमीटर दूर त्रिकूट पर्वत की भैरव घाटी में गिरा। उस स्थान को भैरोनाथ के मंदिर के नाम से जाना जाता है। जब भैरवनाथ ने माँ से माफ़ी मांगी थी तब माँ ने उन्हें माफ़ी देते हुए कहा था “जो कोई भी मेरे दर्शन करने इन खूबसूरत वादियों में आएगा, वह तत्पश्चात तुम्हारे दर्शन भी जरूर करेगा अन्यथा उसकी यात्रा पूरी नहीं कहलाएगी।” इसीलिए आज भी लोग माता के दर्शन के बाद बाबा भैरवनाथ के मंदिर जरूर जाते हैं।

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  • मान्यतानुसार भैरवनाथ को मोक्ष दान देने के बाद वैष्णो देवी ने तीन पिंड (सिर) सहित एक चट्टान का आकार ग्रहण किया और सदा के लिए ध्यानमग्न हो गईं। यह आदिशक्ति के तीन रूप माने जाते हैं – पहली पिंडी मां महासरस्वती की है, जो ज्ञान की देवी हैं; दूसरी पिंडी मां महालक्ष्मी की है, जो धन-वैभव की देवी हैं और तीसरी पिंडी मां महाकाली को समर्पित है, जो शक्ति का रूप मानी जाती हैं।

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