रुद्राक्ष का अर्थ क्या है?

रूद्र का अक्ष , माना जाता है कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के अश्रुओं से हुई है। रुद्राक्ष को प्राचीन काल से आभूषण के रूप में, ग्रह शांति के लिए और आध्यात्मिक लाभ के लिए प्रयोग किया जाता रहा है। कुल मिलाकर मुख्य रूप से सत्तरह प्रकार के रुद्राक्ष पाए जाते हैं। परन्तु ग्यारह प्रकार के रुद्राक्ष विशेष रूप से प्रयोग में आते हैं। मान्यताओं के अनुसार रुद्राक्ष इस धरती पर अकेली ऐसी वस्तु है, जिसे मंत्र जाप और ग्रहों को नियंत्रित करने के लिए सबसे उत्तम माना जाता है। रुद्राक्ष की विशेषताओं और महिमा का बखान शास्त्रों में भी खूब किया गया है। आइए जानते हैं रुद्राक्ष का क्या महत्व है

 

रुद्राक्ष का महत्व 

  • धार्मिक मान्यता है कि भगवान शिव के आंसुओं से पैदा हुआ था रुद्राक्ष
  • रुद्राक्ष एक खास वृक्ष का फल है
  • रुद्राक्ष का विशेष औषधीय और आध्यात्मिक महत्व है
  • इसे धारण करने से व्यक्ति को सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।
  • अकाल मत्यु और शत्रुओं से रक्षा करता है रुद्राक्ष
  • रुद्राक्ष धारण करने वाला और उसकी आराधना करने वाला व्यक्ति समृद्धि,स्वास्थ्य और शांति को प्राप्त करने वाला होता है।
  • रुद्राक्ष की माला से मंत्र जाप करने से अनंत गुना फल मिलता है।
  • एक से लेकर चौदह मुखी  रुद्राक्ष  पाए  जाते  हैं
  • इसके अलावा  गौरी-शंकर और गणेश रुद्राक्ष भी पाया जाता है
  • शिवपुराण, लिंगपुराण, एवं स्कन्द्पुराण आदि में इसका विशेष रूप से वर्णन  किया गया है।

रुद्राक्ष  धारण  करने के  नियम और सावधानियां

रुद्राक्ष  धारण करने के कुछ खास नियम और सावधानियां हैं। जिसका पालन करके आप रुद्राक्ष का पूरा लाभ उठा सकते हैं। बिना नियमों को जाने गलत तरीके से रुद्राक्ष को धारण करने से लाभ नहीं होता , बल्कि कभी-कभी नुकसान भी हो सकता है.

रुद्राक्ष धारण करने के नियम

  • रुद्राक्ष को कलाई, हृदय और गले पर धारण कर सकते है
  • गले में धारण करना सर्वोत्तम होता है। यदि आप कलाई में धारण करना चाहते हैं तो 12, गले में 36 और ह्रदय पर 108 दानों को धारण कर सकते हैं
  • रुद्राक्ष की प्राण-प्रतिष्ठा कर शुभ मुहूर्त मे ही धारण करना चाहिए
  • सावन में, सोमवार, पूर्णिमा, अमावस्या  और शिवरात्री के दिन रुद्राक्ष धारण करना सबसे शुभ होता है
  • रुद्राक्ष धारण करने के पहले उसे भगवान शिव को अर्पित करना चाहिए
  • आत्मिक शुद्धता के द्वारा ही रुद्राक्ष के लाभ को प्राप्त किया जा सकता है, इसलिए रुद्राक्ष धारण करने वाले व्यक्ति को सात्विक रहना चाहिए, रुद्राक्ष विचारों को पवित्र करता है।
  • रुद्राक्ष को हमेशा लाल धागे या पीले धागे में धारण करना चाहिए.
  • 1, 27 , 54 या 108 की संख्या में ही धारण करना चाहिए रुद्राक्ष.
  • रुद्राक्ष को धारण करने के बाद मांस और मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए,
  • प्रातःकाल रुद्राक्ष को धारण करते वक्त और रात में सोने के पहले रुद्राक्ष उतारने के बाद रुद्राक्ष मंत्र तथा रुद्राक्ष उत्पत्ति मंत्र का 9 बार जाप करना चाहिए।
  • रुद्राक्षों में साधारणतया एक से सत्ताइस धारियां होती हैं, जिन्हें मुख कहा जाता है। इन्हीं मुखों के आधार पर उनका वर्गीकरण किया गया है और इन्हीं के अनुरूप उनके फल होते हैं। यहां अलग-अलग मुखों के रुद्राक्षों का विस्तार से विवरण दिया जा रहा है.

मुख के आधार पर रुद्राक्ष के प्रकार

  • भगवान शिव का रूप है एकमुखी रुद्राक्ष
  • श्री गौरी शंकर का स्वरूप है द्विमुखी रुद्राक्ष
  • अग्नि का स्वरूप त्रिमुखी रुद्राक्ष
  • श्री पंचदेव का रूप है चतुर्थमुखी रुद्राक्ष
  • पंचमुखी सर्वदेवमयी माना जाता है
  • षष्ठमुखी रुद्राक्ष है भगवान कार्तिकेय का रूप
  • प्रभु अनंत का रूप है सप्तमुखी रुद्राक्ष
  • अष्टमुखी रुद्राक्ष श्री गणेश का रूप है
  • नव मुखी रुद्राक्ष है मां दुर्गा का स्वरूप
  • दस मुखी रुद्राक्ष है श्रीहरि विष्णु का स्वरूप
  • तेरह मुखी रुद्राक्ष है इंद्रदेव का रूप
  • चौदह मुखी रुद्राक्ष बजरंगबली का स्वरूप है

रुद्राक्ष के हर मुख की अपनी अलग महिमा है। उसकी शक्ति का केंद्र बिंदु है मुख। इन चौदहमुखी रुद्राक्षों के अलावा श्री गणेश और गौरी-शंकर नाम के रुद्राक्ष भी होते हैं। जानकारों की मानें तो यदि रुद्राक्ष का सही ढंग से प्रयोग किया जाए तो सभी कष्टों से आप छुटकारा पा सकते है।

 

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