शिव गृहस्थ भी हैं और विनाशक भी, सुनें अद्भुत रूपों की महिमा !

शिव का रुप अलबेला है, तभी तो वे कभी गृहस्थ हैं, तो कभी विनाशक भी है शिव के इस अलबेले रुप से सभी आश्चर्यचकित भी रहते हैं ।शिव का रुप अलबेला है, उनके तन पर वस्त्र नहीं है, दिशाएं ही उनका वस्त्र है, कमर पर बाघम्बर या हाथी की खाल और सांप लपेट लेते हैं, नहीं तो बर्फीले पहाड़ों पर दिगम्बर ही घूमते हैं। एकांत में उन्मत्त होकर नृत्य करते हैं। ऐसा रुद्र स्वरूप शायद ही किसी और का देखने को मिलें । ‘शिव’ जब अपने स्वरूप में लीन रहते हैं, तब वह सौम्य रहते हैं। जब संसार के अनर्थों पर दृष्टि डालते हैं तो भयंकर रूद्र हो जाते हैं।

पुराणों में शिव के भयंकर रूप का विस्तृत वर्णन है। उनके इस रूप की आकृति भयावह है। उनकी जिह्वा और दृंष्ट्रा बाहर निकली हुई हैं। वे भीषण हैं। वस्त्रहीन होने से दिगम्बर कहे जाते हैं। शरीर पर भस्म का अवलेपन हुआ है इसलिए भस्मनाथ कहे जाते हैं। उनके हाथ में कपाल का कमण्डल, गले में नरमुण्डमाला है और श्मशान उनकी प्रिय विहारभूमि है। संहारकर्ता के रूप में उनका उग्र व रुद्र रूप सामने आता है। इस रूप में उन्हें चण्ड, भैरव, विरुपाक्ष, महाकाल जैसी उपाधियां प्रदान की गई हैं। मत्स्यपुराण में शिव के इस रूप को साक्षात् मृत्यु कहा गया है। इस रूप में उनके अनुचर दानव, दैत्य, यक्ष और गंधर्व रहते हैं। इसलिए वे ‘मृत्युज्जय’ भी हैं। शिव काल के भी काल है इसलिए महाकाल या महाकालेश्वर हैं।

 

शिव का मनमोहक और गृहस्थ रुप:

भगवान शिव का सगुण स्वरूप इतना अद्भुत, मधुर, मनोहर और मोहक है कि उनकी तेजोमयी मंगलमूर्ति को देखकर स्फटिक, शंख, कुन्द, दुग्ध, कर्पूर, चन्द्रमा आदि सभी लज्जित हो जाते हैं। पुराणों में शिव के सौम्य और गृहस्थ रुप का भी उल्लेख किया गया है। इस रूप में वे संपूर्ण मानवजाति के कल्याणकारी देवता हैं। वे नटराज हैं, पार्वती के पति उमामहेश्वर हैं, अर्धनारीश्वर हैं, हरिहर हैं, वृषवाहन हैं, लिंगमूर्ति हैं।

 

भगवान शिव का अनोखा घर-संसार:

भगवान शिव का परिवार बहुत बड़ा है। एकादश रूद्र, रुद्राणियां, चौंसठ योगिनियां,मातृकाएं तथा भैरवादि इनके सहचर तथा सहचरी हैं। इनके समान न कोई दाता है,न तपस्वी, न ज्ञानी है, न त्यागी है, न वक्ता है न उपदेष्टा और न ही कोई ऐश्वर्यशाली। महादेव स्वयं और महादेवी उनकी अर्धांगिनी। एक पुत्र समस्त विघ्नों के विनाशक हैं, और अग्रपूज्य भी तो दूसरे पुत्र देवताओं के सेनापति। स्वंय ऋद्धि-सिद्धि और देवसेना उनकी पुत्रवधुएं हैं । हिमालय का सर्वोच्च शिखर है उनका निवासस्थान.

साधारणतया लोग शिवजी को योगीश्वर कहते हैं, परन्तु वास्तव में वे गृहस्थों के ईश्वर हैं, विवाहित दंपत्तियों के उपास्य देवता हैं। संसार की सारी विषमताओं से घिरे रहने पर भी अपनी चित्तवृत्ति को शान्त एवं स्थिर बनाए रखना ही योग का स्वरूप है। भगवान शिव अपने पारिवारिक सम्बन्धों से हमें इसी योग की शिक्षा देते हैं।

 

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