आदित्यह्रदय स्त्रोत की विशेषता..!

आदित्यह्रदय स्त्रोत ” वाल्मीकि रामायण के युध्कांड का 105वां सर्ग है। आदित्य का अर्थ है – सूर्य भगवान और ह्रदय का अर्थ हुआ दिल, अतः यह प्रभावशाली स्तोत्र भगवन सूर्य जी के ह्रदय की ओर जाने का मार्ग माना गया है। प्रभु श्री राम के विजयी होने के पीछे एक बहुत ही रोचक प्रसंग हैं। भगवान् श्री राम ने स्वयं इसका पाठ रावण से युद्ध के समय किया था। भगवान् श्री राम को विजयी दिलाने के लिए अगस्त्य ऋषि ने इसका वर्णन किया था।

युद्ध के दौरान जब भगवान् राम थककर चिंता करते हुए रणभूमि पर खड़े थे और रावण की विशाल सेवा के सामने उनकी सेना का मनोबल गिरता जा रहा था तो यह  देखकर ऋषि अगस्त्य श्री राम के पास गए और कहा-

“राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम्।

येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसि॥”

अर्थात  “सबके हृदय में रमण करने वाले महाबाहो राम ! यह सनातन गोपनीय स्तोत्र सुनो। वत्स ! इसके जप से तुम युद्ध में अपने समस्त शत्रुओं पर विजय पा जाओगे।”

इसके आगे उन्होंने कहा की इस गोपनीय स्तोत्र का नाम ‘आदित्यहृदय’ है। “यह परम पवित्र और सर्व मंगलकारी स्तोत्र सम्पूर्ण शत्रुओं का नाश करने वाला है। सम्पूर्ण देवता इन्हीं के स्वरूप हैं और इसके जप से सदा विजय की प्राप्ति होती है।” यह सुनकर श्री राम ने प्रसन्न मन से आदित्यहृदय स्त्रोत्र को धारण किया और सूर्य की ओर देखते हुए इसका तीन बार जप करने के बाद अधर्मी रावण का विनाश किया।

अतः इस स्त्रोत्र का नियम अनुसार पाठ करने से सूर्य के सामान तेज़ प्राप्त होता है। अगर पिता के साथ सम्बन्ध अच्छे न हो, युद्ध या मुकदमों में सफलता पाना हो तथा लम्बे समय से चली आ रही आँखों, हड्डियों और विशेषकर ह्रदय रोग से मुक्ति पाने के लिए इसका नित्य पाठ करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है। सूर्योदय के समय नित्य रूप से, विशेषकर रविवार को, आदित्य हृदय स्तोत्र के पाठ से नौकरी में पद-प्रतिष्ठा तथा धन प्राप्ति होती हैं. आत्मविश्वास के साथ-साथ समस्त कार्यों में भी अत्यंत सफलता मिलती है और रुकें हुए कार्य पूर्ण होते है। यह हर क्षेत्र में सफलतादायक है।

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