कैसे शुरू हुई कांवड़ यात्रा ?

क्या था कांवड़ यात्रा के शुरुआत होनें का इतिहास?

सावन महीने के आरंभ होते ही सभी शिवालयों और मंदिरों में भक्तों का तांता लग जाता है। पुरुष हो या महिला हर कोई शिव की भक्ति में लीन हो जाते हैं। कहते हैं, इस महीने में कांवड़ यात्रा करने वाले श्रद्धालु पर भोलेनाथ की कृपा हमेशा बनी रहती है।

Lord Shiva

मान्यता तो ये भी है कि “कांवड़ यात्रा” साक्षात शिव का स्वरुप होती है। शिव भक्तों का मानना है कि सावन के महीने में कांवड़ उठाने वाले भक्तों के साथ चलते हैं स्वयं “भगवान शिव”। वैसे तो कांवड़ यात्रा की शुरुआत को लेकर विद्वानों के अलग-अलग मत रहे हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि भगवान गणेश को एकदंत करने के बाद भोलेनाथ के क्रोध को शांत करने के लिए सबसे पहले भगवान परशुराम ने कांवड़ यात्रा की थी और गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर भोलेनाथ को अर्पित किया था। जबकि कुछ विद्वानों का ये भी मानना हैं कि, सबसे पहले श्रवण कुमार ने त्रेतायुग में कांवड़ यात्रा की शुरुआत की थी। एक और मान्यता के मुताबिक, श्रवण कुमार ने अपने अंधे माता-पिता की इच्छा पूरी करने के लिए उन्हें कांवड़ में बिठा कर हरिद्वार लाए और गंगा स्नान कराया था। एक लोकप्रिय मान्यता ये भी है कि, कांवड़ यात्रा की शुरुआत भगवान राम ने की थी। वह पहले कांवड़िये थे जिन्होंने बिहार के सुल्तानगंज से कांवड़ में गंगा जल भरकर बाबाधाम शिवलिंग में जलाभिषेक किया था। पुराणों के मुताबित, समुद्र मंथन से निकले हलाहल के नकारात्मक प्रभाव को कम करने के लिए शिवजी ने चंद्रमा को अपने माथे पर धारण कर लिया था। इसके बाद सभी देवताओं ने शिव जी पर गंगाजल लाकर अर्पित किया था।

Lord Shiva

सावन के महीने में कांवड़ यात्रा को लेकर कई मान्यता है लेकिन प्रत्येक मान्यता में कांवड़ यात्रा को आस्था का प्रतीक माना जाता है। यह भक्तों का विश्वास है कि, कांवड़ यात्रा के दौरान जो शिवभक्त तमाम कष्टों को सहते हुए गंगाजल लाकर शिवलिंग पर अर्पित करते हैं, भोलेनाथ उनके तमाम कष्टों को हमेशा के लिए हर लेते हैं।

 

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