क्यों और कैसे करते है श्राद्ध? ध्यान रखनी होंगी यह 10 बातें!

श्राद्ध हर साल पितरों को प्रसन्न करने के लिए, उनका ऋण चुकाने के लिए और उनका आशीर्वाद पाने के लिए किया जाता है। माना जाता है की श्राद्ध में प्रसन्न पितृगण मनुष्यों को संतान-सुख, धन, विद्या, आयु, आरोग्य और मोक्ष प्रदान करते हैं। श्राद्ध पक्ष को पितर पक्ष भी कहते है, जिसमे लोग अपने पूर्वजों को याद कर उनके नाम का श्राद्ध करते है।

“श्राद्ध में लोग पिंडदान करते हैं, ब्राहमणों को भोजन करवाते हैं और पितरों के नाम पर पूजा और चढ़ावा करते हैं  पुष्कर में होने वाली सिद्ध श्राद्ध पूजा और पिंडदान बहुत ही प्रचलित है। श्री राम और माँ सीता ने भी राजा दशरथ का श्राद्ध क्रम पुष्कर में ही किया था।”

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तिथि

श्राद्ध तिथियाँ

06 सितंबर

प्रतिपदा श्राद्ध

07 सितंबर

द्वितीया  श्राद्ध

08 सितंबर

तृतीया श्राद्ध

09 सितंबर

चतुर्थी श्राद्ध

10 सितंबर

पंचमी श्राद्ध

11 सितंबर

षष्ठी श्राद्ध

12 सितंबर

सप्तमी श्राद्ध

13 सितंबर

अष्टमी श्राद्ध

14 सितंबर

नवमी श्राद्ध

15 सितंबर

दशमी श्राद्ध

16 सितंबर

एकादशी श्राद्ध

17 सितंबर

द्वादशी श्राद्ध

18 सितंबर

चतुर्दशी श्राद्ध

19 सितंबर

सर्व पितृ अमावस्या व सर्वपितृ श्राद्ध (सभी के लिए )

 किन बातों का रखें ध्यान:

  • श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाना बहुत ही आवश्यक होता है। मान्यता है अगर मनुष्य बिना ब्राह्मण के श्राद्ध-कर्म करता है तो पितर नाराज़ हो जाते है और भोजन करने नहीं आते। श्राद्ध के दिन ब्राह्मणों को भोजन के दौरान दक्षिण दिशा में बैठाना चाहिए।
  • श्राद्ध में सबसे जयादा महत्त्व तिल, चावल, जौ आदि का है। श्राद्ध में तिल और कुशा का सर्वाधिक महत्त्व होता है। श्राद्ध में पितरों को अर्पित किए जाने वाले भोज्य पदार्थ को पिंडी रूप में अर्पित करना चाहिए।
  • रात में श्राद्ध कर्म बिलकुल नहीं करना चाहिए क्योंकि रात के समय को राक्षसी समय माना गया है। दोनों संध्याओं के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए।

  • श्राद्ध भोजन के लिए सोने, चांदी, कांसे या तांबे के पात्र उपयुक्त होते हैं। अगर यह वस्तुए नहीं है तो पत्तल का उपयोग करना चाहिए। केले के पत्तों पर, स्टील या मिटटी के पात्र में श्राद्ध भोजन बिलकुल नहीं करना चाहिए, अशुभ होता है।
  • श्राद्ध में चांदी के बर्तनों का उपयोग व दान करना बहुत ही अच्छा होता है। पितरों के लिए अर्घ्य, पिण्ड और भोजन के बर्तन चांदी के हों तो और भी श्रेष्ठ माना जाता है।
  • इस दिन पितरों के पसंद का भोजन बनाना चाहिए। श्राद्ध का मुख्य पकवान खीर होती है।
  • तुलसी से पितृगण प्रसन्न होते हैं। अतः तुलसी से पिंड की पूजा करने से पितरों को संतुष्टि और प्रसन्ता मिलती है।

  • जो परिजन शस्त्र आदि से मारे गए हों या जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो, उनका श्राद्ध मुख्य तिथि के अलावा चतुर्दशी को भी करना चाहिए। जिनके मरने की तिथि याद नहीं है, उनका श्राद्ध सर्वपितृ अमावस्या के दिन करना चाहिए
  • श्राद्ध गुप्त रूप से करना चाहिए।
  • श्राद्ध कर्म के दौरान अगर कोई जरूरतमंद या भिखारी आ जाए तो उसे आदर और स्नेह से भोजन करवाना चाहिए। ऐसा माना जाता है की इससे श्राद्ध कर्म पूर्ण हो जाता है।

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