Sankasthi Chaturthi Vrat Katha

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Shivangi

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संकष्टी चतुर्थी के व्रत के पीछे एक बहुत ही सुन्दर कहानी सम्बंधित है. एक दिन पूरा शिव परिवार एक साथ बैठे एक अच्छा समय व्यतीत कर रहे थे. अचानक भगवान् शिव ने गणेश और कार्तिके से एक प्रसन पुछा: उन्होंने कहा कि- "आप दोनों में से कौन देवताओं के कष्टों का निवारण कर सकता है।" दोनों ने अपने आप को ही इस कार्य के लिए सक्षम बताया. भगवान शिव ने इस बात पर दोनों की परीक्षा लेने का निश्चय लिया. उन्होंने कहा - "तुम दोनों में से जो सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके आएगा, वही देवताओं की मदद करने जाएगा।" यह बात सुनते ही कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल गए परंतु गणेशजी सोच में पड़ गए. अगर वह अपने वाहन चूहे के ऊपर चढ़कर सारी पृथ्वी की परिक्रमा करते तो इस कार्य में उन्हें बहुत समय लग जाता। उन्हें एक उपाय सूझा। गणेश अपने स्थान से उठें और अपने माता-पिता की सात बार परिक्रमा करकर वापिस बैठ गए। कार्तिके पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करके लौटे और स्वयं को विजेता बताने लगे। तब शिवजी ने श्री गणेश से पृथ्वी की परिक्रमा ना करने का कारण पूछा। भगवान गणेश ने कहा- "माता-पिता के चरणों में ही समस्त लोक हैं।" यह सुनकर भगवान शिव, गणेश जी की इस बात से अत्यंत खुश हुए और उन्हें देवताओं के संकट दूर करने की आज्ञा दी। भगवान शिव ने गणेशजी को आशीर्वाद दिया कि चतुर्थी के दिन जो तुम्हारा पूजन करेगा और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देगा, उसकी हर तरह की परेशानी दूर होंगी। इस दिन व्रत करने से व्रतधारी के सभी तरह के दु:ख दूर होंगे और उसे जीवन के भौतिक सुखों की प्राप्ति होगी। हर तरह से मनुष्य की सुख-समृद्धि बढ़ेगी।

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