ओशो ने हिमालय से पुकारा

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ओशो ने हिमालय से पुकारा, है कोई लेवन हारा। कितने जन्म गंवाए हमने, मिटा न मन का अंधेरा; जब-जब मुक्ति चाही तब-तब, बढ़़ता गया नया घेरा। हाय फिर भी आया ना उजाला, है कोई लेवन हारा। कितनी राहें बदली हमने, कितने भटके-भूले; रूप संवारे, संवर न पाया, दर्पण झूठ न बोले। सच्चा ना रूप निखारा, है कोई लेवन हारा। कितने महल बनाये हमने, खंडहर हो गए सपने; चमन कितने हमने लगाए, बिखर गए सब अपने। तज गोरख धंधा ये सारा, है कोई लेवन हारा। बदली साकी बदली हाला, चूके रागी-बैरागी; ऐसी मदिरा ओशो ने ढाली, सिद्धार्थ को तारी लागी। जागा भाग हमारा, है कोई लेवन हारा।ओशो ने हिमालय से पुकारा, है कोई लेवन हारा। कितने जन्म गंवाए हमने, मिटा न मन का अंधेरा; जब-जब मुक्ति चाही तब-तब, बढ़़ता गया नया घेरा। हाय फिर भी आया ना उजाला, है कोई लेवन हारा। कितनी राहें बदली हमने, कितने भटके-भूले; रूप संवारे, संवर न पाया, दर्पण झूठ न बोले। सच्चा ना रूप निखारा, है कोई लेवन हारा। कितने महल बनाये हमने, खंडहर हो गए सपने; चमन कितने हमने लगाए, बिखर गए सब अपने। तज गोरख धंधा ये सारा, है कोई लेवन हारा। बदली साकी बदली हाला, चूके रागी-बैरागी; ऐसी मदिरा ओशो ने ढाली, सिद्धार्थ को तारी लागी। जागा भाग हमारा, है कोई लेवन हारा।

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